महामृत्युंजय मठ (महाकाल लोक फेसेलिटी सेण्टर – २ ) में अत्यंत प्राचीन समय से स्थापित है । जिसको स्वामी अखिलेश्वरानंद ‘ अंगद शरण जी महाराज ‘ एवं ब्रह्मवादिनी माँ अपर्णा श्री भारती जी ने लगातार महामृत्युंजय यज्ञ करते हुए इस महाकाल वन में यज्ञ रूपी तपोभूमि में अत्यंत पवित्र बनाया है । इस प्राचीन मंदिर एवं अमृत झरना (छोटा कुआं) जिसके अथाह जल के द्वारा महाकाल लोक के निर्माण में कभी भी जल संकट नहीं आया यहा सदैव संतनिवास बना रहा तथा सदैव संत सेवा चलती रही है।
About




मठ का परिचय इस प्रकार है।
महामृत्युंजय मठ
मार्ग निर्देशक
धार्मिक न्याय एवं सामाजिक शांति के सूत्रधार
धार्मिक न्याय एवं सामाजिक शांति के सूत्रधार
ब्रह्मलीन स्वामी श्री अंगद शरण जी महाराज
माँ ब्रह्मवादिनी
श्रीमद जगद्गुरु माँ ब्रह्मवादिनी अपर्णा श्री भारती
धार्मिक न्याय एवं सामाजिक शांति के सूत्रधार ब्रह्मलीन स्वामी श्री अंगद शरण जी महाराज के जीवन के महत्त्वपूर्ण काल की जानकारी
स्वामी श्री अंगद शरण जी का जन्म
स्वामी श्री अंगद शरण जी महाराज उत्तर प्रदेश के गोमती तट सुल्तानपुर में ब्राह्मण कुल में जन्मे और वहीं से उनकी सनातन सेवा प्रारम्भ हो गयी।
मात्र १४ वर्ष की आयु में हनुमंत शैली में श्री रामकथा वाचन
स्वामी अंगद जी महाराज ने १४ वर्ष की अवस्था में प्रयागराज के माघ मेले में श्री रामकथा की अद्भुत शैली में खड़े होकर (हनुमंत शैली) में श्री रामकथा सुनाना प्रारम्भ किया।
प्रयाग महाकुम्भ
सं १९७७ के महाकुम्भ में प्रयाग के विद्वान राजनेता साहित्य मनीषी सभी मंत्रमुग्ध होकर कथा के श्रोता हो चुके थे । महाराज जी के कथा वाचन से प्रभावित होकर जनसभा दूर दूर से एकत्रित होकर उनका लाभ प्राप्त करने लगी।
डीएम प्रयागराज श्री भूरेलाल जी की प्रयाग समीक्षा
सं १९८० में डीएम प्रयागराज श्री भूरेलाल जी ने अपनी प्रयाग समीक्षा में लिखा है की प्रयाग की पावन धरती पर दो विद्वानों ने जनता का दिल जीत लिया श्रीमति इंदिरा गाँधी जी एवं श्री अटल बिहारी जी किन्तु १ महीने तक एक मंच पर शायद इतनी जनता उनहे भी नहीं मिली जो प्रयागराज माघ मेले में स्वामी अंगदजी की श्री राम कथा में रहती है।
मंदिर में स्थापित देवी-देवता
श्री दशरानी माता मंदिर
यह मंदिर देश का एक मात्र मंदिर है। सतयुग से लेकर आज तक जिसपर विपत्ति पड़ी, जिसका राज्य हरण हुआ, यश सम्मान समाप्त हुआ है । माता दशा रानी की पूजा करके उसने सर्वस्व पुनः प्राप्त किया है। देवकी मैया कंस की कैद में माता दशा रानी की उपासना करती थी श्री दशा रानी का कलावा गले में धारण किये थी वासुदेव जी मैया का कलावा (गंडा) अपनी बांह में बंधे थे। विपत्ति में माँ भगवती की उपासना ने ही सहयोग किया था।

महामृत्युंजय मठ में विराजमान भगवान् श्री लक्ष्मी नारायण जी की मनोहर प्रतिमा।

महामृत्युंजय मठ में विराजमान भगवान् श्री राधा कृष्ण जी की मनोहर प्रतिमा।

महामृत्युंजय मठ में विराजमान भगवान् श्री हनुमान जी की मनोहर प्रतिमा।

महामृत्युंजय मठ में विराजमान भगवान् श्री महादेव जी सहपरिवार जी की मनोहर प्रतिमा।

महामृत्युंजय मठ में विराजमान नवग्रह भगवान् जी की मनोहर प्रतिमा।

माँ शाकम्बरी देवी-जिनकी कृपा से उपासना से परिवार से मांस मदिरा का भक्षण समाप्त हो जाता है। फलफूल सब्जी तरकारी इसी से इनकी पूजा करने से मनोकामना सिद्ध होगी भक्तों के कष्ट दूर होंगे । महामृत्युंजय मठ में विराजमान माँ शाकम्बरी देवी जी की मनोहर प्रतिमा।

माँ अन्नपूर्णा जी- सम्पूर्ण मानव जाती के लिए जो अन्नमय कोष है। सबकी तृप्ति करने वाली भगवती शिवा गौरी मैया इनका नाम है।
जय जय गिरिबरराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी॥
जय गजबदन षडानन माता।
जगत जननि दामिनी दुति गाता॥
देवी पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
मोर मनोरथ जानहु नीकें।
बसहु सदा उर पुर सबही कें॥
कीन्हेऊँ प्रगट न कारन तेहिं।
अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥
बिनय प्रेम बस भई भवानी।
खसी माल मुरति मुसुकानि॥
सादर सियँ प्रसादु सर धरेऊ।
बोली गैरी हरषु हियँ भरेऊ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥
नारद बचन सदा सूचि साचा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सांवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एही भाँती गौरी असीस सुनी सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥